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Thursday, May 2, 2013

दिमाग को पढेगा कम्प्यूटर

दिमाग को पढेगा कम्प्यूटर

जल्द ही टेलिपैथी पर आधार रखकर कार्य करने वाले कम्प्यूटर एक वास्तविकता
होंगे. ये कम्प्यूटर प्रयोक्ता के दिमाग की हलचल को महसूस कर उस हिसाब से
कार्य कर सकेंगे. प्रयोक्ता को सिर्फ निर्देशों को दिमाग में पढना होगा
और कम्प्यूटर उस हिसाब से कार्य करने लग जाएंगे. इस तरह के टेलिपैथी
कम्प्यूटर कभी दूर की कौड़ी लगते थे लेकिन अब नहीं.

ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कम्प्यूटर सिस्टम तैयार किया है जो इंसान
के दिमाग को पढ सकता है. यह सिस्टम ना केवल दिमाग को पढ सकता है बल्कि
पुरानी यादों को भी खंगाल सकता है.

कैसे काम करती है यह तकनीक?
यह तकनीक दिमाग के हिप्पोकैम्पस नामक स्थान पर ध्यान केन्द्रीत करती है.
इस स्थान पर छोटी याद संग्रहित होती है. छोटी याद वह बातें होती है
जिन्हें हम थोड़ी देर के लिए ही याद रखते हैं और उसके बाद या तो भूल जाते
हैं या फिर दिमाग उसमें से कुछ हिस्से को हमेशा के लिए संग्रहित कर लेता
है.

परीक्षण:
इस सिस्टम का परीक्षण करने के लिए 10 स्वयंसेवकों को चुना गया और उन्हें
7-7 सेकंड की 3 फिल्में दिखाई गई. इन फिल्मों में रोजमर्रा का कामकाज
करती महिलाएँ दिखाई गई थी. जैसे कि एक महिला चिट्ठी डालने डाकघर जाती है
और एक महिला कॉफी पी रही है आदि.

इसके बाद इन स्वयंसेवकों के दिमाग को एमआईआर स्कैनर से जोड़ा गया और उसका
सम्पर्क इस कम्प्यूटर सिस्टम से स्थापित किया गया. अब स्वयंसेवकों को
निर्देश दिया गया गया के वे उन फिल्मों को उसी क्रम में याद करें जिस
क्रम में उन्हें वह फिल्में दिखाई गई थी.

एमआईआर स्कैनर ने स्वयंसेवकों के दिमाग के रक्त प्रवाह को नोट किया और
उसके आधार पर कम्प्यूटर सिस्टम ने अनुमान लगाया कि अमुक स्वयंसेवक कौन सी
फिल्म को याद कर रहा है. कम्प्यूटर सिस्टम ने करीब 50% तक जवाब सही दिए
जो मात्र सयोंग से अधिक है.

फिलहाल इस तकनीक को थोड़ा और विकसित करने की आवश्यकता है, परंतु भविष्य मे
टेलिपैथी आधारित कम्प्यूटर सिस्टम आम बात होंगे इसमें कोई संदेह नहीं है.

"पर्सनल कम्प्यूटर के जनक" क्यों भूला दिए गए?

क्या आप जानते हैं बिल गेट्स कौन है? क्या आप जानते हैं जॉब स्टीव्स कौन
है? आप जरूर जानते होंगे क्योंकि दोनों ही व्यक्ति अपने अपने क्षैत्र में
काफी सफलता अर्जित कर चुके हैं और सुर्खियों में बने रहते हैं. लेकिन कुछ
लोग ऐसे होते हैं जो गुमनामी में रहना पसंद करते हैं और एक दिन दुनिया
उन्हें भूल जाती है. तब यह मायने नहीं रखता कि उन्होनें तकनीक या अन्य
किसी भी क्षैत्र में कितना बड़ा योगदान दिया था.

ऐसे ही एक व्यक्ति थे डॉ. ई. एडवर्ड रोबर्टस. डॉ. रोबर्ट्स आधुनिक निजी
कम्प्यूटर के जनक थे. हाल ही में 68 वर्ष के डॉ. रोबर्ट्स का निधन
न्यूमोनिया की वजह से हुआ. लेकिन बहुत कम तकनीकविदों और इस क्षैत्र से
जुड़े लोगों ने उनको याद किया. एकमात्र बिल गेट्स उनसे मिलने पहुँचे और
उनके आखिरी समय पर वे उनके पास ही थे.

कौन थे डॉ. रोबर्टस?

डॉ. रोबर्ट्स ने आधुनिक कम्प्यूटिंग तकनीक को विकसित करने में महत्वपूर्ण
योगदान दिया था. उस जमाने में बड़े कम्प्यूटर मशीन हुआ करती थी. डॉ.
रोबर्ट्स ने एक माइक्रोकम्प्यूटर बनाने की सोची जिसे कोई भी व्यक्ति
इस्तेमाल कर सके. उन्होनें 70 के दशक के मध्य में MITS Alter नाम का
माइक्रो कम्प्यूटर बनाया जो कम खर्चीला था और उसे विभिन्न कार्य करने के
लिए प्रोग्राम किया जा सकता था. उनकी इस उपलब्धि को कई इतिहासकार पर्सनल
कम्प्यूटर के विकास की पहली कड़ी मानते हैं. कई इतिहासकारों का मानना है
कि उस जमाने का माइक्रोकम्प्यूटर पहला निजी कम्प्यूटर कहा जा सकता है. इस
लिहाज से डो. रोबर्ट्स को यदि निजी कम्प्यूटर का जनक कहा जाए तो गलत नहीं
होगा.

बिल गेट्स और उनके साथी पॉल एलन ने कभी इस इस प्रोजेक्ट पर काम किया था.
बल्कि इन दोनों ने यहीं से अपने कैरियर की शुरूआत भी की थी. बाद में
दोनों ने डॉ. रोबर्ट्स की दुकान पर काम भी किया था. और आगे चलकर अपनी राह
अलग की और माइक्रोसोफ्ट का जन्म हुआ.

डॉ. रोबर्ट्स ने जब माइक्रो कम्प्यूटर बनाया, उस जमाने में इस तरह के
कम्प्यूटर मौज शौख की वस्तु हुआ करते थे और लोगों ने यह समझा ही नहीं था
कि इस डिवाइज का कितना व्यापक इस्तेमाल किया जा सकता है. डॉ. रोबर्ट्स को
भी यह सम्भावना दिखाई नहीं दी. उन्होनें इस क्षैत्र को त्याग दिया और
अपने चिकित्सा के व्यवसाय में लौट गए.

उन्होनें ज्योर्जिया में मेडिकल प्रेक्टिस शुरू की और बाद में तकनीक की
दुनिया से अलग होते चले गए. लोगों ने भी इनको भूलना शुरू कर दिया. इसलिए
जब डॉ. रोबर्ट्स की मृत्यु हुई तब उनके पास उनके परिवार वाले ही थे, और
हाँ बिल गेट्स भी.

Wednesday, May 1, 2013

अब मेल में भेजें 10 जीबी की फाइलें

gmail







ईमेल में फाइलें सलग्न करनी हो तो उसके आकार को ले कर चिंता बनी रहती है. कहीं 20 एमबी से ज्यादा हुई तो मेल के साथ जुड़ेगी नहीं.

मगर अब गूगल ने अपनी जीमेल सेवा में परिवर्तन करते हुए घोषणा की है कि उसके क्लाउड सेवा गुगल ड्राइव को जीमेल के साथ संगत कर दिया गया है. और इस सेवा के चलते 10 जीबी जितनी बड़ी फाइलें भी आसानी से मेल के साथ भेजी जा सकेगी.


गूगल ड्राइव एक निशुल्क मेघ-भंडारण (क्लाउड स्टोरेज) सेवा है जो प्रयोक्ता को 5 जीबी तक की फाइलें संग्रहित करने की सुविधा देती है.  इसके अतिरिक्त 2.5 डालर का शुल्क अदा कर 25 जीबी तक का भंडारण खरीदा भी जा सकता है.

जीमेल के नए प्रारूप का उपयोग कर रहे प्रयोक्ता ही इस सेवा का लाभ उठा सकते है. क्योंकि इस नए प्रारूप में ही गूगल ड्राइव की कड़ी दी गई है.

मेल के साथ फ़ाइल संलग्न करते समय गूगल ड्राइव के बटन को क्लिक कर फाइल चढ़ाएं.अगर चढाई जा रही फाइल प्राप्तकर्ता के साथ साझा नहीं की गई है तो सेटिंग में जाकर साझा करने के लिए कहा जाएगा.

Sunday, October 14, 2012

प्राइवेट ब्राउज़िंग क्या सचमुच में "प्राइवेट" है?

प्राइवेट ब्राउज़िंग क्या सचमुच में "प्राइवेट" है?


privacy-browsingएपल के सफारी ब्राउज़र ने इसकी पहल की थी और यह सुविधा इतनी लोकप्रिय हुई की बाकी के ब्राउजरों को आगामी वर्षों में यह सुविधा जोड़नी पड़ी. यह सुविधा है "प्राइवेट ब्राउजिंग". यानी कि एक ऐसे वातावरण या मोड में इंटरनेट ब्राउजिंग करना जिससे कि आपने कौन सी साइट खोली और कौन सा पासवर्ड दिया, इस तरह की कोई भी जानकारी कहीं स्टोर नहीं होती. इसलिए जब आप प्राइवेट ब्राउजिंग विंडो बंद कर देते हैं तो निश्चिंत रह सकते हैं कि आपने अभी अभी ओनलाइन कौन सी साइटें खंगाली यह किसी को पता नहीं चलेगा.

परंतु क्या सचमुच ऐसा होता है?

साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि आजकल के हैकर - जो अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हैं - के लिए प्राइवेट ब्राउजिंग प्राइवेट नहीं रही है. कार्निज मेलन विश्वविद्यालय के कोलिन जैक्सन के अनुसार हैकर आसानी से पता लगा सकते हैं कि आपने कौन सी साइटें खंगाली है, चाहें आप ओपन ब्राउजिंग करें या प्राइवेटॅ.

कोलिन जैक्सन और उनके मित्रों ने स्वयं प्राइवेट ब्राउजिंग की पोल खोलते हुए ब्राउज की गई साइटों की जानकारी निकालने का तरीका विकसित कर लिया है. जैक्सन के अनुसार भले ही आप प्राइवेट ब्राउजिंग मोड में इंटरनेट सर्फ करें परंतु खोली गई वेबसाइटों से सम्बंधित की और आँकडे आपके कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क पर संग्रहित हो ही जाते हैं. भले ही ये ऊपर से ना दिखाई दें परंतु हैकर के लिए उन आँकडों तक पहुँचना बडी बात नहीं होती है.

परंतु क्या हैकरों की दिलचस्पी आपके गुप्त आँकडों में होगी?

ब्रिटेन के साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ रिक फेरगसन के अनुसार ऐसा हो सकता है परंतु हैकर पहले उन जानकारियों को प्राप्त करना चाहेंगे जो आसानी से उपलब्ध हो. वैसे भी यदि कोई हैकर तकनीकी रूप से इतना सक्षम है कि आपकी गुप्त ब्राउजिंग के आँकड़े निकाल लाए तो उसमे इतनी "प्रतिभा" तो होगी ही कि वह ऐसे स्पायवेर प्रेषित कर दे जो आपके ब्राउजिंग अनुभव को नर्क समान बना दे. उसकी पहली कोशिश यही होगी.

एक सर्वे के अनुसार अधिकतर लोग प्राइवेट ब्राउजिंग का उपयोग पोर्न साइटो को खोलने के लिए करते हैं. वित्तीय लेनदेन और बैंको के खाते सामान्य मोड पर ही किए जाते हैं. इसलिए प्राइवेट ब्राउजिंग के आँकडे अमूमन निरर्थक ही साबित होते हैं. हैकरों की रूचि हाल फिलहाल ऐसे आँकडों को प्राप्त करने में कम होगी. परंतु इस खबर से यह तो पता चलता है कि इंटरनेट पर "एकदम सुरक्षित" कुछ नहीं है.

कुछ तथ्य:
  • प्राइवेट ब्राउज़िंग को "पोर्न ब्राउजिंग" के रूप में भी जाना जाता है
  • सफारी ने यह सुविधा अप्रैल 29, 2005 को जोड़ी थी
  • दिसम्बर 2008 में गूगल ने क्रोम ब्राउजर लॉंच करते समय यह सुविधा भी उपलब्ध करवाई
  • 2009 में इंटरनेट एक्स्प्लोरर 8 में यह सुविधा उपलब्ध हुई
  • इसी वर्ष फायरफोक्स ने और 2010 में ऑपेरा ने यह सुविधा जोड़ी 

फेसबुक ने लॉच की "प्लेसेस" सुविधा: बताईए कहाँ हैं आप

फेसबुक ने लॉच की "प्लेसेस" सुविधा: बताईए कहाँ हैं आप


facebook-placesफेसबुक ने आखिरकार अपनी बहुप्रतिक्षित "प्लेसेस" सुविधा को लॉंच कर दिया है.
फेसबुक ने अपने पालो आल्टो स्थित मुख्यालय में पत्रकारों को निमंत्रित किया और अपनी नई सुविधा के बारे में जानकारी दी.

फेसबुक
की नई प्लेसेस सुविधा जियो लोकेशन आधारित है और बताती है कि कोई प्रयोक्ता फिलहाल कहाँ है.

यह सुविधा तीन तरह से काम करती है -
  1. इसकी मदद से आप अपने मित्रों को अपने गंतव्य स्थान के बारे में जानकारी दे सकते हैं. इसके लिए आप स्वयं अपने स्थान की जानकारी चिह्नित कर अपने वांछित मित्रों को टैग कर सकते हैं
  2. इसकी मदद से आप जान सकते हैं कि आपके मित्र कहाँ हैं और आपसे कितनी दूर हैं
  3. इसकी मदद से आप अपने आसपास के स्थानों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं

फेसबुक यूँ तो इस सुविधा पर कई महिनों से विचार कर रहा था परंतु इस परियोजना से जुड़े एक शीर्ष सोफ्टवेर इंजीनियर के अनुसार इस सुविधा पर मूल कार्य करीब 8 महिने पहले शुरू हुआ था.

इस बारे में जानकारी देते हुए फेसबुक के मार्क जकरबर्ग ने कहा कि हम इस सुविधा को सुचारू रूप से शुरू करने के लिए प्रयासरत थे और इसके लिए हमने काफी मेहनत की है.

मार्क के अनुसार यह सुविधा फिलहाल वेब और आईफोन अप्लिकेशन के रूप में उपलब्ध होने जा रही है. परंतु फेसबुक इसकी एपीआई भी जारी कर रहा है. यानी थर्ड पार्टी डेवलपर भी अपने तरीके से अप्लिकेशन बना पाएंगे और इस तरह यह सुविधा ब्लैकबेरी और एंड्रोइड आधारित फोनों पर भी उपलब्ध हो जाएगी.

फेसबुक की यह लोकेशन आधारित सुविधा की मदद से प्रयोक्ता विभिन्न स्थलों पर "चैक इन" कर पाएंगे. इसकी एपीआई की मदद से फोरस्कैवर, गोवाला, येल्प और बूया वेबसाइटों के प्रयोक्ता फेसबुक प्लेसेस में चैक इन कर पाएंगे.

मार्क के अनुसार फेसबुक भविष्य में इस सुविधा का वाणिज्यिक उपयोग भी कर पाएगा. इसके लिए विशेष बिजनेस पन्ने बनानी की सुविधा दी जाएगी.

फेसबुक इस सुविधा का वाणिज्यिक इस्तेमाल करने को लेकर कितना गम्भीर है यह इस बात से ही स्पष्ट है कि उसने अभी से विज्ञापन प्रदाताओं से आग्रह करना शुरू कर दिया है कि वे इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए पंजीकरण करें. फेसबुक का इरादा जल्द से जल्द एक बृहद लोकेशन आधारित डायरेक्टरी बनाने का है.
यह किस तरह से काम करेगा?
एक उदाहरण देखिए - आपने अपने शोरूम का स्थान फेसबुक प्लेसेस की मदद से चिह्नित किया है. अब कोई प्रयोक्ता आपके शोरूम में आता है और "चैक इन' करता है. वह अपने मित्रों को टैग करता है और अपने विचार रखता है. ये विचार और वह कहाँ है यह बात उसके मित्रों तक जाती है और वे उसे आगे फैलाते हैं.
इस तरह से आपके शोरूम का ओनलाइन प्रचार होता है. फेसबुक का कहना है कि व्यापारी फेसबुक प्लेसेस की मदद से ठीक उसी तरह से विज्ञापन कर पाएंगे जिस तरह से वे फेसबुक पेज की मदद से करते हैं. यहाँ तक की फेसबुक पेज और फेसबुक प्लेसेस का सम्मिलित रूप लोगों को और भी अधिक आकर्षित करेगा.

जब कोई प्रयोक्ता कहीं चैक इन करता है तो वह कुछ इस तरह से संदेश दे सकता है -
Anniversary Sale!! - at XYZ store, Delhi with Karan Pande and 2 other people

फेसबुक ने अपनी प्लेसेस सुविधा के साथ एक बडी छलांग लगाई है जहाँ उसके पास और उसके प्रयोक्ताओं के पास इसके इस्तेमाल की अपार सम्भावनाएँ हैं. देखना होगा कि लोग इस सुविधा का किस तरह से इस्तेमाल करते हैं.

Official: गूगल ने like.com का अधिग्रहण किया

Official: गूगल ने like.com का अधिग्रहण किया


like-googleजो बात अभी तक गैर अधिकारिक तौर पर कही जा रही थी वह अब अधिकारिक हो गई है. गूगल ने विजुअल शोपिंग सर्च इंजिन like.com का अधिग्रहण कर लिया है. like.com एक भारतीय विजुअल शोपिंग और कीमतों के बीच मूल्यांकन करने वाला सर्च इंजिन है जो प्रयोक्ताओं के द्वारा दिए गए कीवर्ड के हिसाब से ऐसी वस्तुओं की खोज करके देता है जिन्हें ओनलाइन खरीदा जा सकता है.

लाइक.कॉम
के सीईओ मुंजाल शाह ने साइट पर लिखा कि 2006 से लाइक.कॉम ईकोमर्स के क्षैत्र मे अग्रणी रहा है. हम पहले विजुअल सर्च इंजिन थे तो विशेष तौर पर शोपिंग के लिए बनाया गया था. हमने ही सबसे पहले क्रोस मैचिंग की सुविधा दी थी. हम रूके नहीं थे और रूक भी नहीं रहे हैं. गूगल के साथ समझौता होने से हमारा जोश दुगना हो गया है.

like.com एक अन्य फ्रेमवर्क पर आधारित था जो रिया नामक साइट के लिए बनाया गया था. रिया लोगों के चेहरों की पहचान कर उस हिसाब से खोज नतीजे प्रदर्शित करती थी. मुंजाल शाह और उनकी टीम ने इसी तकनीक का इस्तेमाल दूसरे तरीके से किया और सफलता अर्जित की. उन्होने लाइक.क़ॉम नाम विजुअल शोपिंग सर्च इंजिन बनाया जो कि रिया के विचार पर आधारित था परन्तु उसकी वाणिज्यिक क्षमताएँ अधिक थी.

गूगल भी विगत कुछ वर्षों से विजुअल सर्च और चेहरे पहचानने की तकनीक पर काम कर रहा था. 2009 में गूगल ने सिमिलर इमैजेज नामक सुविधा जोडी थी, जो इसी तकनीक पर आधारित थी. परंतु अब लाइक.कॉम का अधिग्रहण करने के बाद उसे इस क्षैत्र में और भी अधिक बढता हासिल होने जा रही है.

इसके लिए गूगल ने अनुमानित तौर पर करीब 100 मिलियन डॉलर चुकाए हैं. इससे लाइक.कॉम को करीब 50 मिलियन डॉलर का लाभ अर्जित हुआ है ऐसी खबरे हैं. दूसरी और मुंजाल शाह और उनकी मुख्य टीम भी लाइक.कॉम के ऊपर काम करती रहेगी.

यूट्यूब से लाखों की कमाई, शीर्ष 10 प्रयोक्ता

यूट्यूब से लाखों की कमाई, शीर्ष 10 प्रयोक्ता


google-youtube-vedioक्या गूगल की प्रसिद्ध वीडियो शेरिंग साइट यूट्यूब से भी कमाई हो सकती है. बिल्कुल. दुनिया के कई लोग इस सेवा की मदद से ना केवल अपने वीडियो अन्य लोगों के साथ साझा कर पाए हैं, बल्कि अच्छी खासी आय भी अर्जित करने में कामयाब हुए हैं.

एक नई शोध के बाद उन शीर्ष 10 लोगों की सूचि जारी की गई है जिन्होनें पिछले वर्ष यूट्यूब पर रखे अपने वीडियो पर आ रहे विज्ञापनों की वजह से सालाना करीब 1

लाख डॉलर यानी की करीब 50 लाख रूपयों से अधिक की कमाई की है. ट्रान के वीडियो पिछले एक वर्ष में करीब 13 करोड 90 लाख बार देखे गए और इससे 1 लाख
डॉलर की कमाई हुई. वैसे ट्रान का चैनल "कम्यूनिटी चैनल' है भी काफी लोकप्रिय. इस चैनल के 7,40,600 से अधिक सबस्क्राइबर हैं.

सिडनी मोर्निंग हेराल्ड की खबर के अनुसार सिडनी की नताली ट्रान ऐसी ही एक प्रयोक्ता हैं जिन्होनें अपने मात्र 10 वीडियो के एक चैनल की मदद से पिछले एक वर्ष के दौरान 1 लाख डॉलर की आय अर्जित की है. यूट्यूब एनालिटिक्स और ट्यूबमोगुलयूज़्ड ने प्रयोक्ताओं के वीडियो को देखे जाने की दर और यूट्यूब के वार्षीक पार्टनर प्रोग्राम के आधार पर यह आँकडे जारी किए हैं. यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम कुछ सबसे लोकप्रिय प्रयोक्ताओं को उनकी क्लिप के नीचे आ रहे विज्ञापनों में से 50% हिस्सा उनको देता है.

इस अभ्यास में जूलाई 2009 से लेकर जूलाई 2010 तक के आँकडों का विश्लेषण किया गया. इस शोध में उन प्रयोक्ताओं को ही शामिल किया गया जो निजी तौर यूट्यूब से जुडे हैं तथा किसी बडे समाचार मीडिया से संबंधित नहीं है.

इस शोध के अनुसार यूट्यूब से सर्वाधिक कमाई करने वाले गैर संस्थानिक व्यक्ति निम्नानुसार हैं -

शेन डॉसन - 3,15,000 डॉलर
द एनोइंग ओरेंज - 2,88,000 डॉलर
फिलिप डेफ्रेंको - 1,81,000 डॉलर
रयान हाइगा - 1,51,000 डॉलर
फ्रेड - 1,46,000 डॉलर
शे कार्ल - 1,40,000 डॉलर
मेडिकोर फिल्मस - 1,16,000 डॉलर
स्मोश - 1,13,000 डॉलर
द यंग तुर्क्स - 1,12,000 डॉलर
नताली ट्रोन - ,1,01,000 डॉलर